सुज़ाक का शुद्ध आयुर्वेदिक उपचार

सुज़ाक, गोनोरिहया (Gonorrhea)-

यह जननेन्द्रिय रोग संभोग द्वारा संक्रमित स्त्री से या संक्रमित पुरूष से स्त्री को हो जाता है। सुज़ाक होते ही लिंग में तीव्र दाह और जलन होती है। लिंग की सुपारी पर सूजन आ जाती है। ऊपर की खाल सिमट जाती है। पीड़ा के साथ-साथ खुजली होती है। लिंग मुख लाल हो जाता है। दबाने से गाढ़ी सफेद पीप निकलती है। सुपारी की पीप प्रारम्भ में कम और बाद में अधिक निकलती है। इन लक्षणों द्वारा इस रोग की आसानी से पुष्टि हो जाती है। यदि समय पर रोग की चिकित्सा नहीं की जाये तो बाद में मूत्र, विकार, सन्धि विकार एवं अन्य कई कष्ट हो जाते हैं।

सुज़ाक की प्राकृतिक चिकित्सा-

इसकी चिकित्सा आरम्भ करने से पहले रोगी से पाचन संबंधी जानकारी लें। यदि कब्ज़ हो तो रात को 25 से 30 मि.ली. तक शुद्ध एरण्ड का तेल गर्म दूध में मिलाकर रात को सोने से पहले पिलायें। प्रातः अगले दिन पेट साफ हो जायेगा। फिर कब्ज़ नहीं हो, इसलिए निम्न बातों पर ध्यान दें।

1. यकृत पोषक औषधि को नियमित रूप से देते रहें। साथ ही गुलकन्द 25 ग्राम और मुनक्के के 10-15 दानें मिलाकर पानी आधा लीटर में अच्छी प्रकार उबालें। जब जल चैथाई भाग रह जाये तो मलकर व छानकर प्रतिदिन रात को रोगी को पिलायें। इसके स्थान पर निम्न योग भी दे सकते हैं।

2. सनाय और गुलाब के फूलों को उबाल कर देने से कब्ज़ दूर हो जाती है।

3. ऐसे योग दें जिससे मूत्र अधिक और खुलकर आये। जैसे- कच्चे दूध में समभाल पानी मिलाकर या लस्सी आदि।

4. शीतलचीनी 25 ग्राम को जौकुट करके जल 200 मि.ली. में उबालें। जब जल 50 मि.ली. शेष रह जाये तो उतार कर ठंडा होने पर छानकर चन्दनष्ठा तेल 8-10 बूंद डालकर पिलायें। इस योग को प्रतिदिन सुबह, दोपहर और सायंकाल लगातार 5 दिन तक दें। इससे मूत्र की जलन ठीक हो जाती है और मूत्र साफ आता है। सुज़ाक के घाव ठीक हो जाते हैं। इसके सेवन काल में गेहूं की पतली रोटी पर घी चुपड़ कर चीनी के साथ खानी चाहिए।

5. शीतल चीनी और देसी खांड समभाग चूर्ण बना लें। 1-1 चाय चम्मच प्रतिदिन 3 बार जल के साथ सेवन करने से कुछ दिनों में सुज़ाक में लाभ होता है।

6. शीतल चीनी के क्वाथ में चन्दन का तेल 5 बूंद मिलाकर प्रतिदिन 3 ार लेने से मूत्र की जलन के साथ मूत्र आना ठीक हो जाता है।

7. सुज़ाक में रक्त दूषित हो जाता है। अतः रक्तशोधक औषधियों का सेवन कराना चाहिए जैसे महामज्जिष्ठादि क्वाथ, महामज्जिष्ठाधारिष्ट, रक्तशोधक शर्बत, रक्तदोषान्तक अर्क, गंधक रसायन आदि। इनके प्रयोग से सुज़ाक में लाभ होता है।

विशिष्ट योग-

1. केले के पेड़ को कूट-पीसकर कपड़े से निचोड़ कर इसका ताजा रस निकाल कर 50 मि.ली. प्रतिदिन 3 बार दें। इसके प्रयोग से मूत्र अधिक मात्रा में आता है और सुज़ाक में आराम आ जाता है।

2. नीम की गोंद 2-3 ग्राम के साथ समभाग मिश्री मिलाकर प्रतिदिन खाने से सुज़ाक में लाभ होता है।

3. घीकुआँर(घीग्वार) के गूदे में मिश्री मिलाकर खाने से 10-15 दिन का नया सुज़ाक 3-4 दिन में ठीक हो जाता है।

4. रेवन्द चीनी का चूर्ण 10 ग्राम प्रतिदिन सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करने से बहुत अधिक मात्रा में लाल मूत्र आता है और लिंग के भीतर के घाव ठीक होकर पुराना सुज़ाक ठीक हो जाता है।

5. गिलोय(गुरूच) का रस 25 मि.ली. में शहद 6 ग्राम मिलाकर प्रतिदिन सुबह, शाम लेने से मूत्र की जलन, प्रमेह और सुज़ाक के अन्य कष्ट दूर हो जाते हैं।

6. हरे आवलों के रस में हल्दी और शहद मिलाकर सुबह-शाम पीने से प्रमेह और सुज़ाक ठीक हो जाता है। हरे आंवले के अभाव में सूखे आंवले का काढ़ा बना लें।

7. हल्दी और सूखे आंवलों का समभाग चूर्ण के बराबर मिश्री का चूर्ण मिला लें। 10-15 ग्राम यह चूर्ण प्रतिदिन जल के साथ लेने से नया सुज़ाक 8 दिन में ठीक हो जाता है।

8. शुद्ध चन्दन और बिरोजे का तेल बराबर-बराबर मिला लें। 20 बूंद या दोनों 10-10 बूंद बताशे में डालकर इसे लेने से तथा धारोष्ण दूध पीने से हर प्रकार का नया-पुराना सुज़ाक ठीक हो जाता है।

9. चन्दन का तेल, बिरोजे का तेल और शीतल चीनी का तेल 10-10 बूंद बताशे में डालकर दें। ऊपर से गाय का धारोष्ण दूध दें।

10. तूतिया(नीला थोथा, काॅपर सल्फेट) एक चावल के बराबर पानी 100 मि.ली. में घोलकर सूई रहित सिरिंज में भरकर लिंग के छेद में पिचकारी करें। कुछ देर बाद रोगी मूत्र करें। ऐसा प्रतिदिन दो बार करने से निश्चित रूप से सुज़ाक में लाभ होता है। इसी प्रकार जिंक सल्फेट 2 चावल भर, पानी 100 मि.ली. में घोलकर पिचकारी करने से लाभ होता है।

11-. सुज़ाक के रोगियों को चन्दनासव का सेवन करना बहुत लाभकारी है।

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